रविवार, 22 जनवरी 2012

बंद दिमागों से चल रहा है हमारा समाज

यदृच्छया/राजेंद्र तिवारी 
(प्रभात खबर से साभार) 




सलमान रुश्दी को लेकर हाय-तौबा मचा हुआ है। कई वर्ग हैं। एक वर्ग है जो कह रहा है कि सलमान रुश्दी को आने देना एक समुदाय की भावनाओं को आहत करना है। दूसरी तरफ एक वर्ग ऐसा है जो सलमान की जान की कीमत लगा रहा है। एक वर्ग है जो इस विवाद के साये में वोटों की गिनती कर रहा है। एक और वर्ग है और जो सबसे बड़ा वर्ग है पर चुप्पी साधे है। लेकिन यह चुप्पी खुद इस सबसे बड़े वर्ग के लिए खतरनाक है। एक तमाशा हो रहा है जयपुर लिटरेरी फेस्ट में। ध्यान रहे यह लिटरेरी फेस्ट है। इसमें पहले तो कुछ मझोले कद के अंग्रेजी लेखकों ने रुश्दी की प्रतिबंधित किताब का पाठ शुरू कर दिया जैसे यह किताब न होकर कोई मंत्र है जिसको जपे बिना ये लेखक धर्मच्युत हो जाएंगे। ऊपर से गजब किया आयोजकों ने यह बयान देकर कि तय कार्यक्रम में इस किताब का पाठ शामिल नहीं है और इसलिए पाठ रुकवा दिया। यह नाटकबाजी क्यों? जिन लेखकों को लग रहा है कि रुश्दी के बिना यह फेस्ट नहीं होना चाहिए, उन्हें पब्लिसिटी का लालच छोड़कर इस फेस्ट में नहीं आना चाहिए था। और जो फेस्ट करा रहे हैं, उनको भी साहित्य का मतलब समझना चाहिए। वे ऐसा बयान देकर इस फेस्ट की गरिमा ही नहीं गिरा रहे बल्कि भाट-चारण की भूमिका में आ गए हैं।

 ये सवाल तो अपनी जगह हैं ही लेकिन बड़ा सवाल यह है कि ये प्रवृत्तियां हमारे समाज को किस तरफ ले जा रही हैं। हम अमेरिका से आगे निकलने के सपने पाले हुए हैं और समाज के स्तर पर हमारी प्रवृत्तियां ठीक उलटा है। ताज्जुब तो इस बात से है कि इन प्रवृत्तियों का वाहक वर्ग बहुत छोटा है फिर भी उस बड़े वर्ग पर हावी है जो उदारमना है। यह सब पिछले 20-25 सालों में ज्यादा हुआ है। पता नहीं यह संयोगमात्र है या फलस्वरूप लेकिन जबसे हम मुक्त बाजार की अवधारणा पर चलने लगे हैं, हमारा समाज स्वार्थ बंद दिमागों से चलना शुरू हो गया है।





मुझे याद है जब 1988 में सलमान रुश्दी की सैटेनिक वर्सेस पर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने प्रतिबंध लगाया था, तब किस तरह पूरे देश में इसका विरोध शुरू हुआ था। विश्वविद्यालयों में प्रदर्शन हुए थे। हर जगह परचे बांटे गए इस प्रतिबंध के खिलाफ। अयातुल्लाह खोमैनी की घोषणा पर हमारे यहां का नौजवान बौखलाया हुआ दिखाई दे रहा था कि खुद को खुदा समझने वाला एक अयातुल्लाह खोमैनी इतिहास चक्र को उल्टा मोड़ना चाहता है। मुझे याद है लखनऊ में किस तरह अमृतलाल नागर जैसे साहित्यकार खड़े हो गए थे। ये सब सैटेनिक वर्सेस के समर्थन में नहीं थे बल्कि इतिहास चक्र को उल्टा मोड़ने वाली प्रवृत्ति के खिलाफ थे। लेकिन आज क्या हो रहा है? देश के शीर्ष विश्वविद्यालयों में से एक दिल्ली विश्वविद्यालय में एके रामानुजन के निबंध ‘थ्री हंड्रेड रामायन्स : फाइव एक्जाम्पल्स एंड थ्री थाट्स आन ट्रांसलेशंस’ को अपने पाठ्यक्रम से इसलिए निकाल दिया कि कुछ लोग इसका विरोध कर रहे थे और कह रहे थे कि इसमें राम और सीता के बारे में आपत्तिजनक बाते हैं। हम आपको बताते चलें कि इसमें दुनिया भर में फैली हुईं रामायण कथाओं का जिक्र है जिसमें अपने यहां की संताल वाचिक परंपरा से ली गई सीता से संबंधित एक कहानी भी है। और इससे पहले देखें, अपने देश के सबसे बड़े कलाकार एमएफ हुसैन को देश बदर कर दिया था इन ताकतों ने। आप खुद सोचिये कि क्या यह सब सिर्फ वोट के लिए नहीं हो रहा? यानी जिनको हम सब जिम्मेदारी दिए हुए हैं राजनीति के जरिए समाज को आगे ले जाने की, वे सत्ता के लिए हम सब को गर्त में ढकेलते जा रहे हैं।

जरा इतिहास में झांक कर देखें – पंद्रहवी सदी में यूरोप में प्रिंटिंग प्रेस की शुरुआत हुई। उस समय पूरा यूरोप टर्की के ओट्टोमन साम्राज्य से डरा हुआ रहता था। जर्मनी में लोगों ने टर्की विरोधी परचे छापने में प्रिंटिंग प्रेस का इस्तेमाल शुरू किया। कुछ वर्ष बाद बासेल में कुरान का अनुवाद लैटिन में किया गया और छापा गया। इस पर यूरोप में मांग उठी कि इस पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए। यह बात 1542 की है। लेकिन मार्टिन लूथर किंग (सीनियर) ने इसका विरोध किया और कुरान के प्रकाशन पर रोक नहीं लगने दी। 1543 में कुरान के तीन संस्करण छपे और फिर सात साल बाद एक और संस्करण छपा। इससे बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता जो यूरोपीय समाज में खुलेपन की शुरुआत को दर्शाए। यह शुरुआत यूरोप को कहां ले गई और बाकी को कहां।
कश्मीर के पत्रकार बशीर मंजर ने  फेसबुक पर लिखा – मुझे ताज्जुब हो रहा है कि मुसलिम संस्थाएं सलमान रुश्दी की यात्रा का विरोध कर रही हैं। क्या हम लोग उस आदमी से इतना डरे हुए हैं कि  उसकी उपस्थिति मात्र से हमें डरावने सपने आने लगते हैं। क्या हममें से कोई रुश्दी का सामना विद्वता के धरातल पर पूर्व आयरिश नन कारेन आर्मस्ट्रांग की तरह नहीं कर सकता। क्या हम अपने को कमजोर, झक्की, प्रतिक्रियावादी और तर्करहित नहीं सिद्ध कर रहे?

और अंत में...

बिना किसी भूमिका के फैज अहमद फैज की यह नज्म पढ़िए...


हम देखेंगे...
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
हम देखेंगे।
जो लाहे अजल में लिखा है
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
हम देखेंगे .
जब जुल्मो-सितम के कोहे गरां
रूई की तरह उड़ जायेंगे
हम महरूमों के पांव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहले हकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़केगी
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
हम देखेंगे
जब अरजे खुदा के काबे से
सब बुत उठवाये जायेंगे
हम अहले सफा मरदूदे हरम
मसनद पे बिठाये जायेंगे
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
हम देखेंगे .
बस नाम रहेगा अल्ला का
जो गायब भी हाजिर भी
जो नाजिर भी है मंजर भी
उठेगा अनलहक का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी ख़ल्के खुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
हम देखेंगे.




सोमवार, 16 जनवरी 2012

पाकिस्तान में सियासी बिसात और सोशल नेटवर्किंग

यदृच्छया/राजेंद्र तिवारी 
(प्रभात खबर से साभार) 






पाकिस्तान एक बार फिर राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। बिसात बिछ चुकी है। शतरंज के खेल के विपरीत इसमें दो नहीं बल्कि तीन खिलाड़ी हैं। एक खेमा है पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल अशफाक कयानी और आईएसआई चीफ ले. जनरल शुजा पाशा का। इनकी पूरी तैयारी एक ही चाल में शह-मात की है। पाकिस्तान का तो पूरा इतिहास ही रहा है कि जनरलों ने जब चाहा, पलक झपकते सत्ता हथिया ली। सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा उनकी मदद की। इस समय भी पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी सेना के खेमे में ही दिखाई दे रहे हैं। लेकिन कोई आयाम ऐसा है जो इनको रोक रहा है। दूसरा खेमा है राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और यूसुफ रजा गिलानी का। यह खेमा इस जुगत में है किसी तरह सेना से सुलह-सुलफा हो जाए। ये खेमा भी बहुत डरा हुआ या मजबूर नजर नहीं आ रहा है। यह बात दीगर है कि सुप्रीम कोर्ट इनकी सरकार को दबाव में लिए हुए है। तीसरा खेमा है विपक्षी दलों का। जिसमें नवाज शरीफ और इमरान खान हैं। ये उत्साहित हैं। ये पूरा माहौल बना रहे हैं कि सरकार ने लोगों का विश्वास खो दिया है और चुनाव की जरूरत है। लगातार रैलियों के जरिए दबाव बढ़ा रहे हैं कि मध्यावधि चुनाव हो जाएं।  जनरल परवेज मुशर्ऱफ भी इस बिसात पर नजर लगाए हैं। लेकिन यह ताज्जुब की बात है कि जिस पाकिस्तान में सेना ने जब चाहा और जैसे चाहा, सत्ता हथिया ली, उसी पाकिस्तान में ऐसा कौन सा आयाम पिछले चार साल में जुड़ गया कि जनरल कयानी उतनी आसानी से तख्तापलट का फैसला नहीं ले पा रहे हैं जितनी आसानी से उनके पूर्ववर्ती जनरलों ने ऐसा कर लिया था। इसलामी उग्रवाद, अमेरिका, चीन, भारत और कश्मीर जैसे एंगल आज की तरह पहले भी थे। पाकिस्तानी अवाम के बारे में पहले भी कहा जाता रहा है और आज भी कहा जा रहा है कि उसे हर किसी ने छला है। पहले उसे मुंह बंद रखना पड़ता था। लेकिन अब सोशल नेटवर्किंग साइट्स का ऐसा हथियार मिला हुआ जिस पर पूरी तरह तब तक अंकुश नहीं लग सकता जबतक कि पूरा मुल्क उसके लिए तैयार न हो। पाकिस्तान में लगभग दो करोड़ इंटरनेट यूजर्स हैं और इसमें से 60 लाख फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं। सोशल बेकर्स डाट काम नाम की साइट के मुताबिक, इस क्राइसिस के दौरान फेसबुक पर कमेंट करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। इसमें से 76 फीसदी लोग 18-34 वर्ष के आयुवर्ग के हैं। पिछले साल कराची में हुए इंटरनेशनल सोशल मीडिया समिट के मुताबिक, पाकिस्तान में करीब 62 लाख लोग ट्विटर का इस्तेमाल करते हैं और इसमें से करीब 30 लाख सोशल जर्नलिस्ट के तौर पर सक्रिय हैं। पिछले छह माह में पाकिस्तान में फेसबुक यूजर्स की संख्या 12 लाख और ट्विटर यूजर्स की संख्या करीब 20 लाख बढ़ी है। 2008 के मुकाबले तो यह वृद्धि पांच गुने से ज्यादा है। पिछले एक साल में पाकिस्तान के लोग इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर राजनीतिक रूप से ज्यादा मुखर हुए हैं। इन लोगों के जरिए पाकिस्तान में इतिहास को लेकर सवाल किये जा रहे हैं, आजादी की लड़ाई के प्रस्तुतीकरण को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं, बाग्लादेश के अलग होने को लेकर पहली बार भारत और रा की जगह वहां के हुक्मरानों को जिम्मेदार ठहराने का सिलसिला शुरू हुआ। इन सबका असर वहां के मीडिया पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। कट्टर भारत विरोधी नवा-ए-वक्त जैसे अखबार समूह के अंग्रेजी दैनिक में छप रहे कालमों में इस तरह के सवालों का उठना किस ओर इशारा करता है?
ऐसा नहीं हो सकता कि जनरल कयानी और पाशा पाकिस्तानी मिडिल क्लास के इस इंपावरमेंट को समझते न हों। इमरान खान की पार्टी के फेसबुक पेज पर 2.37 लाख लोग लाइक करते हैं. करीब 93 हजार लोग उस पेज पर चर्चाओं में हिस्सा लेते हैं और ट्विटर पर 20 हजार से ज्यादा लोग इमरान की पार्टी को फालो करते हैं। यही नहीं, पिछले कुछ दिनों में करीब सात लाख लोगों ने एसएमएस के जरिए इमरान की पार्टी की सदस्यता के लिए आवेदन किया। इस सबको देखते हुए कहा जा सकता है कि बंटवारे के बाद पहली बार पाकिस्तान के लोगों का दबाव सत्ता वर्ग पर दिखाई दे रहा है और शायद एक वजह यह भी है कि तुरत-फुरत रेडियो-टीवी पर कब्जा करके और प्रधानमंत्री को गिरफ्तार कर तख्तापलट की गुंजाइश इस बार कम दिखाई दे रही है। पहले खेमे की हिचकिचाहट, जरदारी-गिलानी के भयाक्रांत न दिखने और नवाज शरीफ व इमरान खान के उत्साह में कहीं न कहीं कुछ भूमिका इस इंपावरमेंट की भी हो सकती है।


और अंत में...
अशोक वाजपेयी आधुनिक हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर हैं। हालांकि हिंदी साहित्य में खेमेबंदी के चलते उनको उतना सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार हैं। इस बार अंत में उनकी ही एक कविता -


तुम चले जाओगे
पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे
जैसे रह जाती है
पहली बारिश के बाद
हवा में धरती की सोंधी-सी गंध
भोर के उजास में
थोड़ा-सा चंद्रमा
खंडहर हो रहे मंदिर में
अनसुनी प्राचीन नूपुरों की झंकार
तुम चले जाओगे
पर थोड़ी-सी हँसी
आँखों की थोड़ी-सी चमक
हाथ की बनी थोड़ी-सी कॉफी
यहीं रह जाएँगे
प्रेम के इस सुनसान में
तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति
छंद की तरह गूँजता
तुम्हारे पास होने का अहसास
तुम चले जाओगे
और थोड़ा-सा यहीं रह जाओगे

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

पुनि-पुनि चंदन, पुनि-पुनि पानी शालिग्राम सरिगे, हम का जानी

यदृच्छया/राजेंद्र तिवारी 
(प्रभात खबर से साभार) 


वर्ष २०११ का यह आखिरी रविवार है। चूंकि मैं पत्रकार हूं, लिहाजा मेरे दिमाग़ में भी यही सवाल है कि साल की बड़ी ख़बरें क्या रहीं। मैं ये ख़बरें गिनाकर बोर नहीं करना चाहता। लेकिन जब मैं साल की बड़ी ख़बरों के बारे में सोच रहा था तो सबसे बड़ी बात यह उभर कर सामने आई कि दुनिया आज जिस वैचारिक विकल्पहीनता सेगुज़र रही है, उतना संकट पिछले १०० सालों में शायद ही देखने को मिला हो। मिस्र का जनउभार हो, अपने यहाँ का अन्ना आंदोलन हो या अमेरिका में एक फीसदी बनाम ९९ फीसदी का सवाल उठाने वाले प्रदर्शन, कहीं कोईवैचारिक स्पष्ता नहीं है। मुझे तो बचपन में सुना हुआ एक किस्सा याद आ रहा है। एक पंडित का बेटा बहुत शैतान था। पंडित जी बेचारे बहुत परेशान थे। पंडित जी सुबह शाम पूजा करते थे और काले पत्थर की बटिया के रूप में शालिग्राम को सुबह शाम गंगाजल से स्नान कराते थे और चंदन लगाते थे। एक दिन पंडित जी के बच्चे की नज़र काली बटिया पर पड़ी। बच्चा उसे लेकर खेलने लगा। खेल में वह बटिया कहीं खो गई। बच्चे को पता था कि अब पंडित जी उसको बहुत कूटेंगे। बच्चे ने कुटाई से बचने के लिए बहुत दिमाग़ लगाया। आषाढ़ का महीना था। गांव में जामुनों की बहार थी। बच्चे के दिमाग में आइडिये का बल्ब जला और उसने पूजा में शालिग्राम की जगह जामुन रख दिया। पंडित जी पूजा करने बैठे। उन्होनें आचमनी से शालिग्राम पर गंगाजल डाला और जैसे उन्होनें शालिग्राम को पोंछा, तो गूदा उतर गया और गुठली हाथ में आ गई। पंडित जी का पारा सातवें आसमान पर था। उन्होंने चिल्लाकर बच्चे से कहा कि तुमने शालिग्राम उठाया था। बच्चे ने कहा नहीं। पंडित ज और जोर से चिल्लाए। इस पर बच्चे ने सफाई दी- पुनि-पुनि चंदन,  पुनि-पुनि पानी, शालिग्राम सरिगे हम का जानी। यानी बार-बार आप चंदन लगाते हैं, बार-बार पानी से नहलाते हैं। ऐसे में हो सकता है कि शालिग्राम सड़ गये हों, इसमें मेरा क्या कुसूर। ये तो एक किस्सा है लेकिनआज के संदर्भ में देखें तो लगता है कि असली शालिग्राम जामुन बन चुका है। और उसी पर पुनि-पुनि चंदन, पुनि-पुनि पानी। मतलब यह कि कोई नया विचार नहीं, कोई विकल्प नहीं। समाज, राजनीति और अर्थ में खदर-बदर तो है लेकिन आगे कोई राह नहीं, कोई नवोन्मेष नहीं। २०११ यही खदर-बदर देकर जा रहा है और २०१२ के लिए चुनौती के रूप में नवोन्मेष की जरूरत। इस साल का हिट गाना भी वर्षांत में ही आया - व्हाई दिस कोलावेरी डी... कोलावेरी डी भी इसी विकल्पहीनता और विचारशून्यता को परिलक्षित करता है। है न! ऐसा गाना हिट हो जाए जिसका कोई अर्थ न निकलता हो तो उसे और क्या कहेंेगे? देखना यह होगा क्या नये साल मे यह कोलावेरी डी मौजूदा खदर-बदर को किसी सार्थक हस्तक्षेप में बदल पाएगा कि नहीं? यह उलटबांसी ही है लेकिन नये रास्ते उलटबांसियों से ही निकलते हैं।
और अंत में...शमशेर बहादुर सिंह की बहुत प्रसिद्ध कविता है - बात बोलेगी। साल के अंतिम रविवार के यदृच्छया के अंत में इससे बेहतर कविता क्या होगी -

बात बोलेगी
हम नहीं।
भेद खोलेगी 
बात ही।

सत्य का मुख
झूठ की आँखें

क्या-देखें!
सत्य का रूख़
समय का रूख़ है

अभय जनता को
सत्य ही सुख है

सत्य ही सुख।
दैन्य दानव काल
भीषण क्रूर
स्थिति कंगाल
बुद्धि घर मजूर।
सत्य का
क्या रंग है?-

पूछो
एक संग।

एक-जनता का
दुःख: एक।

हवा में उड़ती पताकाएँ
अनेक।

दैन्य दानव। क्रूर स्थिति।
कंगाल बुद्धि: मजूर घर भर।

एक जनता का - अमर वर:
एकता का स्वर।
-अन्यथा स्वातंत्र्य-इति।


हर क्षेत्र में सृजन, नवविचारों और नवोन्मेषों का साल हो २०१२, इन्हीं उम्मीदों के साथ शुभकामनाएँ .....

नीतीश ने कहा था, अफसर देर करे तो वह पैसा देख रहा होगा

यदृच्छया/राजेंद्र तिवारी 
(प्रभात खबर से साभार)


(11 दिसंबर, 2011 को प्रकाशित)
हमारी व्यवस्था कितनी संवेदनहीन और गैरजवाबदेह है, इसका उदाहरण है कोलकाता के अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस एमआऱआई अस्पताल का अग्निकांड। जिंदगी की उम्मीद में आने वाले लोगों को मौत मिली। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्विटर पर लिखा है कि हम वाकई तीसरी दुनिया के देश हैं लेकिन वहम पाले हुए हैं विकसित देशों की कतार में खड़े होने का। लेकिन सवाल यह है कि इस सबके लिए जिम्मेदार कौन है। पहले पढ़िए, जिम्मेदार अफसरों ने क्या कहा... कोलकाता अग्निशमन विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि अस्पताल में फायर कंट्रोल सिस्टम ठीक हालत में नहीं था। अस्पताल का स्टाफ आग जैसी आपात स्थितियों से निबटने में सक्षम नहीं था और न उनको इसकी कोई ट्रेनिंग दी गई। अस्पताल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि अस्पताल में फायर सेफ्टी नियमों का पूरा अनुपालन किया जा रहा था, इमारत में स्मोक डिटेक्टर और अग्निशामक यंत्र लगे हुए थे। न्यूयार्क टाइम्स को शुक्रवार को दिये गये इंटरव्यू में कहा कि फायर सेफ्टी राज्यों का विषय है, केंद्र के तहत यह नहीं आता। अलबत्ता, भारतीय राष्ट्रीय विल्डिंग संहिता 2005 नाम से एक कानून है जिसमें इमारतों में सुरक्षा के नियमन दिये गए हैं लेकिन यह कानून राज्यों पर तब तक लागू नहीं होता जब तक राज्यों की विधानसभाएं इसे लागू करने का कानून न बनायें। 2005 में ही आपदा नियंत्रण कानून बना लेकिन इसमें आग को शामिल नहीं किया गया। यानी कहीं कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं।
इस कांड के बाद जो बातें सामने आईं, उनमें कुछ नया नहीं हैं। मसलन बीते अप्रैल में फायर ब्रिगेड ने अस्पताल को नोटिस जारी किया था कि अस्पताल बेसमेंट का इस्तेमाल पार्किंग के लिये न कर के गैस सिलिंडर, कबाड़ और लकड़ी के बाक्स रखने को स्टोर के लिए कर रहा है। इस नोटिस में अस्पताल को तीन माह के भीतर बेसमेंट से स्टोर हटाने को कहा गया था। इसके बाद क्या हुआ, कोई कुछ नहीं बता रहा। लेकिन फायर ब्रिगेड ने यह कह कर अपनी जिम्मेदारी से हाथ झाड़ लिया क्योंकि उसने तो नोटिस जारी कर दी थी। लेकिन सवाल जो हम सबको पूछना चाहिए कि क्या अस्पताल प्रबंधन के साथ-साथ सरकारी महकमें भी बराबर को दोषी नहीं हैं? हम जानते हैं कि आगे क्या होगा। जांच बैठेगी। बहुत त्वरित जांच हुई तो कुछ माह में रिपोर्ट आएगी। उस रिपोर्ट के आधार पर दोषियों पर मुकदमा चलेगा। लेकिन शायद ही कोई सरकारी अधिकारी इस जांच में फंसेगा। जिन अधिकारियों ने नोटिस जारी की लेकिन फिर कोई कार्रवाई नहीं की, क्या इसके कारणों का पता लगाया जाएगा, क्या यह पता लगाया जाएगा कि इतनी गंभीर लापरवाही को ठीक करने के लिए तीन माह क्यों दिये, तुरंत क्यों नहीं अस्पताल को बंद कर बेसमेंट को पार्किंग के लिए खाली करने को कहा गया? मुझे तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बात याद आ रही है कि यदि कोई अफसर ऐसे मामलों में ढीलमढाल करता है तो जरूर उसे पैसा दिखाई दे रहा होगा। यह बात हर जगह लागू है।

सिब्बल और सोशल साइट्स
कपिल सिब्बल मुझे बहुत समझदार व्यक्ति लगते थे। लेकिन जबसे मैंने टीवी पर बाबा रामदेव की अगवानी में दिल्ली एयरपोर्ट पर कपिल सिब्बल को हैरान-परेशान मुद्रा में देखा, तबसे कुछ और तस्वीर बन गई उनकी मेरे जेहन में। अगर आपने वह दृश्य टीवी पर देखा हो तो याद करिये। हाल में उन्होंने सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर प्रतिबंध की बात कही और फंसने पर कहा कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले कमेंट्स उन पर आते हैं, उनका इरादा इन्हीं कमेंट्स को रोकने का है। कपिल सिब्बल जैसे नेता शायद हमें-आपको ढोर-ढंगर से ज्यादा कुछ नहीं समझते कि जो वे कहेंगे, उसके आगे कोई कुछ सोच ही नहीं पाएगा। वैसे कांग्रेस शायद सोची-समझी रणनीति के तहत यह बात फैलाने का षडयंत्र कर रही है कि भारत की सबसे बड़ी समस्या यहां ज्यादा लोकतंत्र का होना है। बाबा रामदेव प्रकरण, अन्ना हजारे प्रकरण और अब सोशल साइट्स पर सेंसरशिप के प्रस्ताव से क्या इस षडयंत्र की बू नहीं आती? 70 के दशक में कांग्रेस ने यह फैलाना शुरू किया था कि मेधावी छात्रों और अच्छे लोगों को राजनीति से दूर रहना चाहिए। उनकी यह रणनीति सफल भी रही। उसके बाद नक्सलबाड़ी या जेपी आंदोलन जैसा कोई युवा आंदोलन नहीं खड़ा हो पाया। आज भी मां-बाप अपने बच्चों को राजनीति से दूर रहने की सलाह देते हैं।
.
 और अंत में...

फरीद खां पटना के रहने वाले हैं। फेसबुक पर मैंने पढ़ीं इस टिप्पणी के साथ कि उनकी कविताएँ वाकई में जिंदगी का अहसास दिलाती रहती हैं। आपके होने का याद दिलाती हैं। आप मर तो नहीं रहें, यह सवाल भी आपसे करती हैं। पढें और पढाएँ। मैंने पढ़ा और आपको पढ़ा रहा हूं...

वह अपना हिसाब मांगेगा

जिसे पता ही नहीं कि उसे बेच दिया गया है,
और एक दिन राह चलते अचानक ही उसे किसी ग़ैर से पता चले
कि उसे बेच दिया गया है.
तो आज नहीं तो कल,
वह अपना हिसाब मांगेगा ही.

पानी अपना हिसाब मांगेगा एक दिन.
लौट कर आयेगा पूरे वेग से,
वापस मांगने अपनी ज़मीन.

पहले लगता था
पहले लगता था कि जो सरकार बनाते हैं,
वे ही चलाते हैं देश.
पहले लगता था कि संसद में जाते हैं
हमारे ही प्रतिनिधि.

पहले लगता था कि सबको एक जैसा अधिकार है.

पहले लगता था कि अदालतों में होता है इंसाफ़.
पहले लगता था कि अख़बारों में छपता है सच.
पहले लगता था कि कलाकार होता है स्वच्छ.

पहले लगता था कि ईश्वर ने बनाई है दुनिया,
पाप पुण्य का होगा एक दिन हिसाब.
पहले लगता था कि मज़हबी इंसान ईमानदार तो होता ही है.
पहले लगता था कि सच की होगी जीत एक दिन,
केवल आवाज़ उठाने से ही सुलझ जाता है सब.

अभी केवल इतना ही लगता है,
कि सूरज जिधर से निकलता है,
वह पूरब ही है,
और डूबता है वह पच्छिम में. बस.

इंसान अच्छा और ताकतवर एक साथ न बन सका

यदृच्छया/राजेंद्र तिवारी
(प्रभात खबर से साभार)
आज साल का पहला दिन है। इसलिए सबसे पहले आप सबको शुभकामनाएँ। हम उन राहों को चुनने की हिम्मत और हौसला कर सकें जिनको हम इसलिए खारिज करते रहते हैं कि कोई तो इन पर नहीं चला, ज़रूर कोई वजह होगी। लेकिन इस वजह को जानने की कोशिश अमूमन हम नहीं करते। लेकिन शायद ये राहें ही नवोन्मेष के दरवाजे खोलतीं हैं। बीते साल ने हमारे वैचारिक खोखलेपन को इस साल के लिए चुनौती के तौर पर प्रस्तुत किया है। अगर हम अपने देश की बात करें तो हमारा राजनीतिक चिंतन जिस राष्ट्र-राज्य की अवधारणा से पर केंद्रित है जिसे पश्चिम से आयात किया गया है। गांधी के बाद हमारे समाज ने कोई ऐसा राजनीतिक चिंतक नहीं दिया जो अपने समाज के मूल्यों को प्रतिबिंबित करता हो। हमारा संविधान भी उसी राष्ट्र-राज्य की अवधारणा पर आधारित है, गांधी के चिंतन पर नहीं। यहीं पर दिक्कत आती है।
मैं इस हफ्ते लखनऊ में हुई एक अनौपचारिक चर्चा का ज़िक्र करना चाहूंगा। इस चर्चा में भारत सरकार के ए़क बड़े अफसर, दो फिजिक्स के प्राध्यापक, एक वैज्ञानिक, एक न्यायाधीश और एक किसान शामिल थे। सवाल था कि भारतीय संविधान बहुसंख्य भारतीयों का कितना ध्यान रखता है और ऐसा क्यों होता है कि क़ानून की व्याख्या अलग-अलग व्यक्तियों के लिए अलग-अलग होती है? इस सवाल पर गरमागरम बहस हुई। पहले सवाल पर चर्चा में निकलकर आया कि हमारा संविधान पश्चिम के जिस राष्ट्र-राज्य की अवधारणा पर आधारित है, उसी के चश्मे से संविधान की उपादेयता का आंकलन किया जाना चाहिए, हम यदि भारतीय समाज के मूल्यों के आधार पर इसका आंकलन करेंगे तो निराशा हाथ लग सकती है। जैसे त्याग हमारे समाज के लिए बहुत बड़ा मूल्य है लेकिन पश्चिम में यह मूल्य है ही नहीं। यही वजह है कि यदि हमारे यहाँ कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को त्याग कर अपने भाई-बहनों को ज़िंदगी के लिए काम करता है तो उसके छोटे-मोटे कई अपराधों की समाज अनदेखी कर उसे अच्छा व्यक्ति ही मानता है। लेकिन पश्चिमी समाज में ऐसा नहीं है। हम संविधान को इन्हीं मूल्यों पर कसते हैं।
हम सब्जेक्टिव होते हैं और सिस्टम आब्जेक्टिविटी की अपेक्षा करता है। यहीं पर समस्या आती है। यह सब्जेक्टिविटी क़ानून की व्याख्या बदल देती है, यह सब्जेक्टिविटी नियमों की परिभाषा बदल देती है। अब सवाल यह उठता है कि क्या कोई सिस्टम इस सब्जेक्टिविटी को मिनिमाइज करने की मैकेनिज्म से लैस हो सकता है। इस पर जान नैश की गेम थ्योरी का ज़िक्र हुआ कि समाज कोई भी हो, हर व्यक्ति स्थितियों से अपने लिए फ़ायदे को मैक्सिमाइज करने की कोशिश करता है। एक किस्सा भी सामने आया कि एक बार एक गाँव में सूखा पड़ गया। पुरोहित ने बताया कि यदि गाँव का हर आदमी रात को अपने-अपने घर से एक लोटा दूध तालाब में डाले। इससे तालाब दूध से भर जाएगा। तालाब दूध से भर जाएगा तो बारिश होने लगेगी। सब तैयार हुए, मुहुर्त निकाला गया। रात में सबने पुरोहित के कहे मुताबिक एक-एक लोटा दूध तालाब में डालने का वचन दिया। लेकिन यह क्या, सुबह तालाब में दूध नहीं पानी भरा था। दरअसल हुआ यह कि हर आदमी ने सोचा कि बाकी तो दूध डालेंगे ही, यदि मैं एक लोटा पानी भी डाल दूंगा तो किसी को रात में क्या पता चलेगा। और सबने पानी ही डाला। मतलब यह कि हर व्यक्ति अपने फ़ायदे को मौक्सिमाइज करना चाहता था। यह किस्सा इसलिए सुनाया गया कि चर्चा में एक कोने से यह बात उठ रही थी कि गेम थ्योरी भारतीय समाज के मूल्यों को प्रतिबिंबित नहीं करती। आप भी सोचिए इन सवालों पर। आप मुझे अपनी बात मेल करेंगे तो इन सवालों पर चर्चा आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। फिलहाल यह बात यहीं समाप्त करते हैं।

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ...

फेसबुक पर नोबेल पुरस्कार से सम्मानित पोलिग कवियित्री विस्लावा शिम्बोर्स्का की एक कविता काफी दिन पहले पढ़ी थी। करीब १०-१२ साल पहले लिखी गई यह कविता बीत गए साल और नए साल की उम्मीदों के नाम पर पोस्ट के रूप में फेसबुक पर पिछले दिनों देखी। २०वीं सदी के अंत में लिखी गई यह कविता पढ़कर आप समझ सकते हैं कि इस सदी के ११ साल में हम एक क़दम भी आगे नहीं बढ़े। आप भी पढ़िए यह कविता....

आखिर हमारी सदी भी बीत चली है
इसे दूसरी सदियों से बेहतर होना था
लेकिन अब तो
इसकी कमर झुक गई है
साँस फूल गई है

कुछ समस्याएं थीं जिन्हें हल कर लेना था
मसलन भूख और लड़ाइयां
हमें बेबसों के आंसुओं के लिए
दिल में सम्मान जगाना था
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ

आज ये हालात है कि
सुख एक मारीचिका बनकर रह गया है
कोई नहीं हंसता है बेवकूफियों पर
और न ही फख्र करता है
अक्लमंदी पर
अब तो यह उम्मीद भी
सोलह साला हसीना नहीं रही

हमने सोचा था कि
आखिरकार खुदा को भी
एक अच्छे और ताकतवर इंसान पर भरोसा करना होगा
लेकिन अफसोस
इंसान अच्छा और ताकतवर
एक साथ नहीं बन सका

आखिर हम जियें तो कैसे जियें
किसी ने ख़त में पूछा था
मैं भी तो यही पूछना चाहती थी
जैसा कि आप देख चुके हैं
हर बार वही होता है
सबसे अहम सवाल
सबसे बचकाने
ठहरा दिये जाते हैं


रविवार, 4 दिसंबर 2011

जन-गण-मन के देवता, अब तो आंखे खोल

यदृच्छया/प्रभात ख़बर



पिछले रविवार मैंने एक गीत का ज़िक्र किया था। यह गीत था १९५७ में लाहौर में बनी उर्दू फ़िल्म बेदारी का। आओ बच्चों सैर करायें तुमको पाकिस्तान की, जिसकी खातिर हमने दी कुर्बानी लाखों जान की और यूँ दी हमें आजादी कि दुनिया हुई हैरान, ऐ कायद-ए-आजम तेरा अहसान है अहसान गीत भी इसी फ़िल्म के हैं। यह फ़िल्म पाकिस्तान की सर्वकालिक बेहतरीन फ़िल्मों में मानी जाती है। १९५४ में अपने यहां एक फिल्म बनी थी जागृति। इसके गीत याद करिए....आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झाँकी हिंदुस्तान की, इस मिट्टी से तिलक करो यह मिट्टी है बलिदान है, हम लाये हैं तूफान से किस्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के और दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल। ये गीत लिखे थे कवि प्रदीप ने। इस फिल्म में केंद्रीय किरदार मास्टर रतन (नजीर रिजवी) का था। पाक फिल्म बेदारी में केंद्रीय किरदार मास्टर रतन का ही था। ये वही मास्टर रतन हैं जिन्होंने बूट पालिश फिल्म में केंद्रीय भूमिका निभाई थी। मास्टर रतन अजमेर के रहने वाले थे और 1956 में इनका परिवार पाकिस्तान चला गया। जाहिर है कि मास्टर रतन भी पाकिस्तान चले गए। वहां जागृति की तर्ज पर रफीक रिजवी (लोग प्यार से उन्हें बापू भी कहते थे) ने फिल्म बनाने का प्रस्ताव रखा जिसे मास्टर रतन ने मान लिया। यह फिल्म जागृति का कार्बन कापी थी। महात्मा गांधी का स्थान ले लिया कायद-ए-आजम जिन्ना ने और हिंदुस्तान की जगह पाकिस्तान कर दिया गया। यही नहीं इसका नाम भी वही रहा (जागृति का उर्दू पर्यायवाची है बेदारी)। उस समय के उभरते हुए पाकिस्तानी गायक सलीम रजा ने कवि प्रदीप के लिखे हुए गीतों को पाकिस्तान के हिसाब से कस्टमाइज कर दिया। सलीम रजा ने इस फिल्म के गीत गाये भी। इनका संगीत बिलकुल जागृति के गीतों वाला ही है। आप यदि लफ्जों पर न ध्यान दें तो लगेगा जैसे जागृति के गीत ही सुन रहे हैं। लेकिन वहां संगीत का क्रेडिट दिया गया उस समय के मशहूर संगीतकार फतेह अली खान को। यह फिल्म 6 दिसंबर 1957 को पाकिस्तान में रिलीज हुई। इस फिल्म को और इसके गीतों को यूट्यूब पर देखा-सुना जा सकता है।

लेकिन इसका जिक्र मैं इसलिए यहां नहीं कर रहा हूं कि यह जागृति की कार्बन कापी है, बल्कि इसलिए कर रहा हूं कि हम यह समझ सकें कि पाकिस्तान आज जहां है, वह मंजिल बरसों पहले ही वहां के जनमानस में भर दी गई थी। दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल की तर्ज पर बने गीत यूं दी हमें आजादी.... की कुछ लाइनें देखिए। इनसे ऐतिहासिक तथ्यों और पाकिस्तान के कुलीन वर्ग के बीच की खाईं का अंदाजा लगाया जा सकता है-

हर सिम्त मुसलमानों पर छाई थी तबाही

मुल्क अपना था और गैरों के हाथों में थी शाही

ऐसे में उठा दीन-ए-मुह्म्मद का सिपाही

और नारा-ए-तकबीर से दी तूने गवाही

इसलाम का झंडा लिये आया सरे मैदान

ऐ कायद-ए-आजम तेरा अहसान है अहसान....

नक्शा बदल के रख दिया इस मुल्क (पाकिस्तान) का तूने

साया था मुहम्मद का, अली का तेरे सिर पे

दुनिया से कहा तूने, कोई हमसे न उलझे

लिक्खा है इस जमीं पे शहीदों ने लहू से

आजाद हैं, आजाद रहेंगे ये मुसलमान

ऐ कायद-ए-आजम तेरा अहसान है अहसान....




रिटेल का खेल

रिटेल में एफडीआई को लेकर खूब हल्ला मच रहा है। 1 दिसंबर को भारत बंद भी रखा गया। विरोध और समर्थन, दोनों तरफ के लोग अफलातूनी बयान दे रहे हैं। मैं दो बातें यहां रखना चाहता हूं जिन पर गौर करने की जरूरत है। पहली बात यह कि किराना दुकानदारों की संख्या अपने देश में एक करोड़ बताई जा रही है। सवाल यह है कि यह संख्या कहां से आयी? इस लिहाज से देखा जाए तो 130 करोड़ की आबादी वाले अपने देश के हर 130 लोगों (इसमें करीब 25 फीसदी बच्चे भी शामिल हैं) पर एक किराने की दुकान है। जरा अपने गांव या मोहल्ले पर नजर डालिए और जांचिए इस आकड़े की सच्चाई को। दूसरी बात, 1 दिसंबर को पंजाब में बंद नहीं रहा जबकि वहां विपक्षी दलों की सरकार है। इस पर भी गौर करना चाहिए कि ऐसा क्यों है और पंजाब वाले बाकी देश से अलग क्यों सोचते हैं? मेरा कहने का मतलब यह कतई नहीं है कि रिटेल में एफडीआई को लेकर घोषित केंद्र की मौजूदा नीति का समर्थन किया जाए लेकिन इतना जरूर है कि विरोध व समर्थन करने वाले लोगों को तर्कसंगत बातें करनी चाहिए। अन्यथा, वही होगा जो नब्बे के दशक में डंकेल ड्राफ्ट के विरोध का हुआ। उस समय ये लोग कह रहे थे कि डंकेल आएगा और हमारी फसल काट ले जाएगा। आडवाणी जी से लेकर लालू जी तक। बाद में जब इनकी सरकारें आईं तो वित्तमंत्री उन्हीं लोगों को बनाया गया जो डंकेल प्रस्तावों को लागू कर सकें। अगर उस समय विरोधी दल गंभीरता से मुद्दा उठाते और कोई समझदारी भरी बहस चलाते तो शायद हम उस बहस से निकले रास्ते पर चल रहे होते। तब भी शायद मकसद सिर्फ सत्तापक्ष के खिलाफ माहौल बनाना था (न कि विचार के स्तर पर कोई रास्ता बनाने का)। आज भी जो हो रहा है, वह उन्हीं डंकेल प्रस्तावों का हिस्सा है। विरोध करने वाले राजनीतिक दल इस बार भी क्या सिर्फ सत्तापक्ष के खिलाफ माहौल बनाने का काम नहीं कर रहे?





और अंत में...

फेसबुक पर एक कविता पढ़ी, मजा आया। आप भी पढ़िए...

जन-गण-मन के देवता

अब तो आंखें खोल

मंहगाई से हो गया जीवन डांवाडोल

जीवन डांवाडोल, ख़बर लो शीघ्र कृपालु

कलाकंद के भाव बिक रहा बैगन-आलू।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

यह प्रवृत्ति हमें कहां ले जाएगी

यदृच्छया/राजेंद्र तिवारी
प्रभात खबर से साभार



बीते हफ्ते दिल्ली में हरविंदर सिंह नाम के एक युवक ने कृषि मंत्री शरद पवार को चांटा मार दिया। इसको लेकर तमाम तरह की बातें हो रही हैं। जो गांधी कहते थे कि कोई तुम्हारे एक गाल पर चांटा मारे, तुम अपना दूसरा गाल आगे कर दो, वहीं इस समय देश में उम्मीद की निगाहों से देखे जाने वाले बुजुर्ग गांधीवादी नेता की पवार प्रकरण पर त्वरित प्रतिक्रिया थी- बस एक ही मारा! प्रमुख विपक्षी दल के एक प्रमुख नेता ने कहा कि मंहगाई से परेशान लोग हिंसक हो उठेंगे। फेसबुक पर देखें तो कई पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी माने जाने वाले लोग लिख रहे हैं कि बहुत कोशिश की पवार को चांटा मारे जाने का विरोध करूं लेकिन कर नहीं पा रहा हूं। यह पहली घटना नहीं है, इससे पहले भी इस तरह की घटनाएं हुई हैं। हरविंदर जैसे सामान्य व्यक्ति ही नहीं, जितिन प्रसाद जैसे सांसद, जिन्हें हम युवा पीढ़ी का राजनीतिक मानते हैं, भी हाथ छोड़ने में पीछे नहीं हैं। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का अभिमान करने वाले हमारे समाज को क्या होता जा रहा है और क्यों होता जा रहा है? कहां गड़बड़ हो रही है? यह राजनीतिकों को ही नहीं, हम-आप को भी सोचना पड़ेगा। इस सवाल के मूल में जाना पड़ेगा और इसका समाधान खोजना होगा। मुझे कुछ वाकये याद हैं, जो बचपन में मैंने अपने गांव में दादा जी से और अपने गांव वाले स्कूल सुने-देखे थे। कुछ वाकये बड़े होने पर राजनीतिकों से सुने। उनमें कुछ शेयर करना चाहूंगा-
बचपन में मेरे दादा जी ने यह वाकया सुनाया था। बात 50 के दशक की है, खटीमा में नेहरू जी की सभा थी। खटीमा उत्तर प्रदेश के तराई इलाके में पड़ता था, जहां पाकिस्तानी पंजाब से आए सिखों को बसाया गया था। अब यह उत्तराखंड का हिस्सा है। बीच में चौकी डालकर माइक लगा दिया गया था। लोग उस चौकी के सामने बड़ी संख्या में एकत्र थे। लोग 100-100 किलोमीटर से खुद चलकर नेहरू को सुनने आए थे। नेहरू बोल रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि एक तरफ कुछ सिख युवक उनको काला झंडा दिखा रहे थे। नेहरू ने भाषण रोका, चौकी से नीचे उतरे और भीड़ को चीरते हुए उन युवकों के पास पहुंच गए। उनके हाथ से काला झंडा लिया और उसे फाड़कर फेंक दिया। युवकों को कुछ समझाया और फिर लौटकर भाषण शुरू किया।
दूसरी घटना मेरे गांव के पास के उस स्कूल की है, जहां से मैंने स्कूली पढ़ाई पूरी की। इमरजेंसी खत्म हो गई थी। चुनाव प्रचार चल रहा था। मेरा स्कूल संघ के प्रभाव वाला था और उसके कई शिक्षक संघ की शाखाएं लगाने का काम करते थे। वहां पहले जेपी की सभा हुई। पांच बच्चों को जेपी के लिए स्वागत गान गाने के लिए चुना गया। मैं भी उनमें से था। बाद में इंदिरा गांधी की सभा भी उसी स्कूल में हुई और वही हम पांच बच्चे उनके स्वागत में भी वही गान गाने के लिए चुने गए।
तीसरी घटना जो मैने लखनऊ के समाजवादी नेता चंद्रदत्त तिवारी जी से सुनी थी। 1966 में प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी अपने गृहनगर इलाहाबाद आने वाली थीं। 1965 के युद्ध की वजह से महंगाई चरम पर थी। इलाहाबाद में जहां कांग्रेसी लोगों ने उनके स्वागत की तैयारी की, वहीं कुछ अन्य लोगों ने महंगाई के विरोध में उन्हें काला झंडा दिखाने की घोषणा की। इंदिरा गांधी आईं तो सड़क के एक तरफ के लोग कांग्रेसी तिरंगे को लहरा कर उनका स्वागत कर रहे थे तो सड़क के दूसरी तरफ काला झंडा दिखाकर उनके सामने विरोध जता रहे थे। उस समय जतिन प्रसाद की तरह कांग्रेस के नेताओं ने काले झेंडे वालों पर लात घूंसे बरसाने नहीं शुरू कर दिए थे।
एक घटना अभी टीवी पर सुनी मोहन सिंह से। वह बता रहे थे कि फिरोज गांधी इलाहाबाद से चुनाव लड़ रहे थे। उनके विरोधी सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार नंदलाल के पास कार नहीं थी। फिरोज गांधी दोपहर 12 बजे से शाम चार बजे तक आराम करते थे। इस दौरान वे अपनी कार नंदलाल को दे देते कि लो तब तक आप इस कार से अपना प्रचार कर लीजिए।
हम कहां से कहां आ गए हैं। हमारा देश भले आज समृद्धि की राह पर बढ़ने का दावा कर रहा हो लेकिन हमारे समाज में जो प्रवृत्तियां पनप रही हैं, वे कतई विकसित समाज की ओर ले जाने वाली नहीं हैं।
और अंत में...
हम सब ने एक गीत जरूर सुना होगा “हम लाये हैं तूफान से किस्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के”। जागृति फिल्म का यह गीत प्रदीप ने लिखा था और अभि भट्टाचार्या पर फिल्माया गया था। इसी तरह का एक गीत और पढ़िए यहां। इसके बारे बात अगले रविवार को करेंगे-
बरसों के बाद फिर उड़े परचम हिलाल के
हम लाये हैं तूफान से किश्ती निकाल के
इस मुल्क को रखना मेरे बच्चों संभाल के
देखो कहीं उजड़े न हमारा ये बगीचा
इसको लहू से अपने शहीदों ने है सींचा
इसको बचाना जान मुसीबत में डाल के
हम लाये हैं...
दुनिया के सियासत के अजब रंग हैं न्यारे
चलना है तुमको तो मगर कुरान के सहारे
हर एक कदम उठाना जरा देखभाल के
इस मुल्क को रखना मेरे...
तुम राहत-ओ-आराम के झूले में न झूलो
काटों पे है चलना मेरे हंसते हुए फूलों
लेना अभी कश्मीर है, ये बात भूलो
कश्मीर में लहराएंगे झंडा उछाल के
इस मुल्क को रखना मेरे बच्चों संभाल के।