शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

नीतीश ने कहा था, अफसर देर करे तो वह पैसा देख रहा होगा

यदृच्छया/राजेंद्र तिवारी 
(प्रभात खबर से साभार)


(11 दिसंबर, 2011 को प्रकाशित)
हमारी व्यवस्था कितनी संवेदनहीन और गैरजवाबदेह है, इसका उदाहरण है कोलकाता के अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस एमआऱआई अस्पताल का अग्निकांड। जिंदगी की उम्मीद में आने वाले लोगों को मौत मिली। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्विटर पर लिखा है कि हम वाकई तीसरी दुनिया के देश हैं लेकिन वहम पाले हुए हैं विकसित देशों की कतार में खड़े होने का। लेकिन सवाल यह है कि इस सबके लिए जिम्मेदार कौन है। पहले पढ़िए, जिम्मेदार अफसरों ने क्या कहा... कोलकाता अग्निशमन विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि अस्पताल में फायर कंट्रोल सिस्टम ठीक हालत में नहीं था। अस्पताल का स्टाफ आग जैसी आपात स्थितियों से निबटने में सक्षम नहीं था और न उनको इसकी कोई ट्रेनिंग दी गई। अस्पताल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि अस्पताल में फायर सेफ्टी नियमों का पूरा अनुपालन किया जा रहा था, इमारत में स्मोक डिटेक्टर और अग्निशामक यंत्र लगे हुए थे। न्यूयार्क टाइम्स को शुक्रवार को दिये गये इंटरव्यू में कहा कि फायर सेफ्टी राज्यों का विषय है, केंद्र के तहत यह नहीं आता। अलबत्ता, भारतीय राष्ट्रीय विल्डिंग संहिता 2005 नाम से एक कानून है जिसमें इमारतों में सुरक्षा के नियमन दिये गए हैं लेकिन यह कानून राज्यों पर तब तक लागू नहीं होता जब तक राज्यों की विधानसभाएं इसे लागू करने का कानून न बनायें। 2005 में ही आपदा नियंत्रण कानून बना लेकिन इसमें आग को शामिल नहीं किया गया। यानी कहीं कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं।
इस कांड के बाद जो बातें सामने आईं, उनमें कुछ नया नहीं हैं। मसलन बीते अप्रैल में फायर ब्रिगेड ने अस्पताल को नोटिस जारी किया था कि अस्पताल बेसमेंट का इस्तेमाल पार्किंग के लिये न कर के गैस सिलिंडर, कबाड़ और लकड़ी के बाक्स रखने को स्टोर के लिए कर रहा है। इस नोटिस में अस्पताल को तीन माह के भीतर बेसमेंट से स्टोर हटाने को कहा गया था। इसके बाद क्या हुआ, कोई कुछ नहीं बता रहा। लेकिन फायर ब्रिगेड ने यह कह कर अपनी जिम्मेदारी से हाथ झाड़ लिया क्योंकि उसने तो नोटिस जारी कर दी थी। लेकिन सवाल जो हम सबको पूछना चाहिए कि क्या अस्पताल प्रबंधन के साथ-साथ सरकारी महकमें भी बराबर को दोषी नहीं हैं? हम जानते हैं कि आगे क्या होगा। जांच बैठेगी। बहुत त्वरित जांच हुई तो कुछ माह में रिपोर्ट आएगी। उस रिपोर्ट के आधार पर दोषियों पर मुकदमा चलेगा। लेकिन शायद ही कोई सरकारी अधिकारी इस जांच में फंसेगा। जिन अधिकारियों ने नोटिस जारी की लेकिन फिर कोई कार्रवाई नहीं की, क्या इसके कारणों का पता लगाया जाएगा, क्या यह पता लगाया जाएगा कि इतनी गंभीर लापरवाही को ठीक करने के लिए तीन माह क्यों दिये, तुरंत क्यों नहीं अस्पताल को बंद कर बेसमेंट को पार्किंग के लिए खाली करने को कहा गया? मुझे तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की बात याद आ रही है कि यदि कोई अफसर ऐसे मामलों में ढीलमढाल करता है तो जरूर उसे पैसा दिखाई दे रहा होगा। यह बात हर जगह लागू है।

सिब्बल और सोशल साइट्स
कपिल सिब्बल मुझे बहुत समझदार व्यक्ति लगते थे। लेकिन जबसे मैंने टीवी पर बाबा रामदेव की अगवानी में दिल्ली एयरपोर्ट पर कपिल सिब्बल को हैरान-परेशान मुद्रा में देखा, तबसे कुछ और तस्वीर बन गई उनकी मेरे जेहन में। अगर आपने वह दृश्य टीवी पर देखा हो तो याद करिये। हाल में उन्होंने सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर प्रतिबंध की बात कही और फंसने पर कहा कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले कमेंट्स उन पर आते हैं, उनका इरादा इन्हीं कमेंट्स को रोकने का है। कपिल सिब्बल जैसे नेता शायद हमें-आपको ढोर-ढंगर से ज्यादा कुछ नहीं समझते कि जो वे कहेंगे, उसके आगे कोई कुछ सोच ही नहीं पाएगा। वैसे कांग्रेस शायद सोची-समझी रणनीति के तहत यह बात फैलाने का षडयंत्र कर रही है कि भारत की सबसे बड़ी समस्या यहां ज्यादा लोकतंत्र का होना है। बाबा रामदेव प्रकरण, अन्ना हजारे प्रकरण और अब सोशल साइट्स पर सेंसरशिप के प्रस्ताव से क्या इस षडयंत्र की बू नहीं आती? 70 के दशक में कांग्रेस ने यह फैलाना शुरू किया था कि मेधावी छात्रों और अच्छे लोगों को राजनीति से दूर रहना चाहिए। उनकी यह रणनीति सफल भी रही। उसके बाद नक्सलबाड़ी या जेपी आंदोलन जैसा कोई युवा आंदोलन नहीं खड़ा हो पाया। आज भी मां-बाप अपने बच्चों को राजनीति से दूर रहने की सलाह देते हैं।
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 और अंत में...

फरीद खां पटना के रहने वाले हैं। फेसबुक पर मैंने पढ़ीं इस टिप्पणी के साथ कि उनकी कविताएँ वाकई में जिंदगी का अहसास दिलाती रहती हैं। आपके होने का याद दिलाती हैं। आप मर तो नहीं रहें, यह सवाल भी आपसे करती हैं। पढें और पढाएँ। मैंने पढ़ा और आपको पढ़ा रहा हूं...

वह अपना हिसाब मांगेगा

जिसे पता ही नहीं कि उसे बेच दिया गया है,
और एक दिन राह चलते अचानक ही उसे किसी ग़ैर से पता चले
कि उसे बेच दिया गया है.
तो आज नहीं तो कल,
वह अपना हिसाब मांगेगा ही.

पानी अपना हिसाब मांगेगा एक दिन.
लौट कर आयेगा पूरे वेग से,
वापस मांगने अपनी ज़मीन.

पहले लगता था
पहले लगता था कि जो सरकार बनाते हैं,
वे ही चलाते हैं देश.
पहले लगता था कि संसद में जाते हैं
हमारे ही प्रतिनिधि.

पहले लगता था कि सबको एक जैसा अधिकार है.

पहले लगता था कि अदालतों में होता है इंसाफ़.
पहले लगता था कि अख़बारों में छपता है सच.
पहले लगता था कि कलाकार होता है स्वच्छ.

पहले लगता था कि ईश्वर ने बनाई है दुनिया,
पाप पुण्य का होगा एक दिन हिसाब.
पहले लगता था कि मज़हबी इंसान ईमानदार तो होता ही है.
पहले लगता था कि सच की होगी जीत एक दिन,
केवल आवाज़ उठाने से ही सुलझ जाता है सब.

अभी केवल इतना ही लगता है,
कि सूरज जिधर से निकलता है,
वह पूरब ही है,
और डूबता है वह पच्छिम में. बस.

इंसान अच्छा और ताकतवर एक साथ न बन सका

यदृच्छया/राजेंद्र तिवारी
(प्रभात खबर से साभार)
आज साल का पहला दिन है। इसलिए सबसे पहले आप सबको शुभकामनाएँ। हम उन राहों को चुनने की हिम्मत और हौसला कर सकें जिनको हम इसलिए खारिज करते रहते हैं कि कोई तो इन पर नहीं चला, ज़रूर कोई वजह होगी। लेकिन इस वजह को जानने की कोशिश अमूमन हम नहीं करते। लेकिन शायद ये राहें ही नवोन्मेष के दरवाजे खोलतीं हैं। बीते साल ने हमारे वैचारिक खोखलेपन को इस साल के लिए चुनौती के तौर पर प्रस्तुत किया है। अगर हम अपने देश की बात करें तो हमारा राजनीतिक चिंतन जिस राष्ट्र-राज्य की अवधारणा से पर केंद्रित है जिसे पश्चिम से आयात किया गया है। गांधी के बाद हमारे समाज ने कोई ऐसा राजनीतिक चिंतक नहीं दिया जो अपने समाज के मूल्यों को प्रतिबिंबित करता हो। हमारा संविधान भी उसी राष्ट्र-राज्य की अवधारणा पर आधारित है, गांधी के चिंतन पर नहीं। यहीं पर दिक्कत आती है।
मैं इस हफ्ते लखनऊ में हुई एक अनौपचारिक चर्चा का ज़िक्र करना चाहूंगा। इस चर्चा में भारत सरकार के ए़क बड़े अफसर, दो फिजिक्स के प्राध्यापक, एक वैज्ञानिक, एक न्यायाधीश और एक किसान शामिल थे। सवाल था कि भारतीय संविधान बहुसंख्य भारतीयों का कितना ध्यान रखता है और ऐसा क्यों होता है कि क़ानून की व्याख्या अलग-अलग व्यक्तियों के लिए अलग-अलग होती है? इस सवाल पर गरमागरम बहस हुई। पहले सवाल पर चर्चा में निकलकर आया कि हमारा संविधान पश्चिम के जिस राष्ट्र-राज्य की अवधारणा पर आधारित है, उसी के चश्मे से संविधान की उपादेयता का आंकलन किया जाना चाहिए, हम यदि भारतीय समाज के मूल्यों के आधार पर इसका आंकलन करेंगे तो निराशा हाथ लग सकती है। जैसे त्याग हमारे समाज के लिए बहुत बड़ा मूल्य है लेकिन पश्चिम में यह मूल्य है ही नहीं। यही वजह है कि यदि हमारे यहाँ कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को त्याग कर अपने भाई-बहनों को ज़िंदगी के लिए काम करता है तो उसके छोटे-मोटे कई अपराधों की समाज अनदेखी कर उसे अच्छा व्यक्ति ही मानता है। लेकिन पश्चिमी समाज में ऐसा नहीं है। हम संविधान को इन्हीं मूल्यों पर कसते हैं।
हम सब्जेक्टिव होते हैं और सिस्टम आब्जेक्टिविटी की अपेक्षा करता है। यहीं पर समस्या आती है। यह सब्जेक्टिविटी क़ानून की व्याख्या बदल देती है, यह सब्जेक्टिविटी नियमों की परिभाषा बदल देती है। अब सवाल यह उठता है कि क्या कोई सिस्टम इस सब्जेक्टिविटी को मिनिमाइज करने की मैकेनिज्म से लैस हो सकता है। इस पर जान नैश की गेम थ्योरी का ज़िक्र हुआ कि समाज कोई भी हो, हर व्यक्ति स्थितियों से अपने लिए फ़ायदे को मैक्सिमाइज करने की कोशिश करता है। एक किस्सा भी सामने आया कि एक बार एक गाँव में सूखा पड़ गया। पुरोहित ने बताया कि यदि गाँव का हर आदमी रात को अपने-अपने घर से एक लोटा दूध तालाब में डाले। इससे तालाब दूध से भर जाएगा। तालाब दूध से भर जाएगा तो बारिश होने लगेगी। सब तैयार हुए, मुहुर्त निकाला गया। रात में सबने पुरोहित के कहे मुताबिक एक-एक लोटा दूध तालाब में डालने का वचन दिया। लेकिन यह क्या, सुबह तालाब में दूध नहीं पानी भरा था। दरअसल हुआ यह कि हर आदमी ने सोचा कि बाकी तो दूध डालेंगे ही, यदि मैं एक लोटा पानी भी डाल दूंगा तो किसी को रात में क्या पता चलेगा। और सबने पानी ही डाला। मतलब यह कि हर व्यक्ति अपने फ़ायदे को मौक्सिमाइज करना चाहता था। यह किस्सा इसलिए सुनाया गया कि चर्चा में एक कोने से यह बात उठ रही थी कि गेम थ्योरी भारतीय समाज के मूल्यों को प्रतिबिंबित नहीं करती। आप भी सोचिए इन सवालों पर। आप मुझे अपनी बात मेल करेंगे तो इन सवालों पर चर्चा आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। फिलहाल यह बात यहीं समाप्त करते हैं।

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ...

फेसबुक पर नोबेल पुरस्कार से सम्मानित पोलिग कवियित्री विस्लावा शिम्बोर्स्का की एक कविता काफी दिन पहले पढ़ी थी। करीब १०-१२ साल पहले लिखी गई यह कविता बीत गए साल और नए साल की उम्मीदों के नाम पर पोस्ट के रूप में फेसबुक पर पिछले दिनों देखी। २०वीं सदी के अंत में लिखी गई यह कविता पढ़कर आप समझ सकते हैं कि इस सदी के ११ साल में हम एक क़दम भी आगे नहीं बढ़े। आप भी पढ़िए यह कविता....

आखिर हमारी सदी भी बीत चली है
इसे दूसरी सदियों से बेहतर होना था
लेकिन अब तो
इसकी कमर झुक गई है
साँस फूल गई है

कुछ समस्याएं थीं जिन्हें हल कर लेना था
मसलन भूख और लड़ाइयां
हमें बेबसों के आंसुओं के लिए
दिल में सम्मान जगाना था
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ

आज ये हालात है कि
सुख एक मारीचिका बनकर रह गया है
कोई नहीं हंसता है बेवकूफियों पर
और न ही फख्र करता है
अक्लमंदी पर
अब तो यह उम्मीद भी
सोलह साला हसीना नहीं रही

हमने सोचा था कि
आखिरकार खुदा को भी
एक अच्छे और ताकतवर इंसान पर भरोसा करना होगा
लेकिन अफसोस
इंसान अच्छा और ताकतवर
एक साथ नहीं बन सका

आखिर हम जियें तो कैसे जियें
किसी ने ख़त में पूछा था
मैं भी तो यही पूछना चाहती थी
जैसा कि आप देख चुके हैं
हर बार वही होता है
सबसे अहम सवाल
सबसे बचकाने
ठहरा दिये जाते हैं


रविवार, 4 दिसंबर 2011

जन-गण-मन के देवता, अब तो आंखे खोल

यदृच्छया/प्रभात ख़बर



पिछले रविवार मैंने एक गीत का ज़िक्र किया था। यह गीत था १९५७ में लाहौर में बनी उर्दू फ़िल्म बेदारी का। आओ बच्चों सैर करायें तुमको पाकिस्तान की, जिसकी खातिर हमने दी कुर्बानी लाखों जान की और यूँ दी हमें आजादी कि दुनिया हुई हैरान, ऐ कायद-ए-आजम तेरा अहसान है अहसान गीत भी इसी फ़िल्म के हैं। यह फ़िल्म पाकिस्तान की सर्वकालिक बेहतरीन फ़िल्मों में मानी जाती है। १९५४ में अपने यहां एक फिल्म बनी थी जागृति। इसके गीत याद करिए....आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झाँकी हिंदुस्तान की, इस मिट्टी से तिलक करो यह मिट्टी है बलिदान है, हम लाये हैं तूफान से किस्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के और दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल। ये गीत लिखे थे कवि प्रदीप ने। इस फिल्म में केंद्रीय किरदार मास्टर रतन (नजीर रिजवी) का था। पाक फिल्म बेदारी में केंद्रीय किरदार मास्टर रतन का ही था। ये वही मास्टर रतन हैं जिन्होंने बूट पालिश फिल्म में केंद्रीय भूमिका निभाई थी। मास्टर रतन अजमेर के रहने वाले थे और 1956 में इनका परिवार पाकिस्तान चला गया। जाहिर है कि मास्टर रतन भी पाकिस्तान चले गए। वहां जागृति की तर्ज पर रफीक रिजवी (लोग प्यार से उन्हें बापू भी कहते थे) ने फिल्म बनाने का प्रस्ताव रखा जिसे मास्टर रतन ने मान लिया। यह फिल्म जागृति का कार्बन कापी थी। महात्मा गांधी का स्थान ले लिया कायद-ए-आजम जिन्ना ने और हिंदुस्तान की जगह पाकिस्तान कर दिया गया। यही नहीं इसका नाम भी वही रहा (जागृति का उर्दू पर्यायवाची है बेदारी)। उस समय के उभरते हुए पाकिस्तानी गायक सलीम रजा ने कवि प्रदीप के लिखे हुए गीतों को पाकिस्तान के हिसाब से कस्टमाइज कर दिया। सलीम रजा ने इस फिल्म के गीत गाये भी। इनका संगीत बिलकुल जागृति के गीतों वाला ही है। आप यदि लफ्जों पर न ध्यान दें तो लगेगा जैसे जागृति के गीत ही सुन रहे हैं। लेकिन वहां संगीत का क्रेडिट दिया गया उस समय के मशहूर संगीतकार फतेह अली खान को। यह फिल्म 6 दिसंबर 1957 को पाकिस्तान में रिलीज हुई। इस फिल्म को और इसके गीतों को यूट्यूब पर देखा-सुना जा सकता है।

लेकिन इसका जिक्र मैं इसलिए यहां नहीं कर रहा हूं कि यह जागृति की कार्बन कापी है, बल्कि इसलिए कर रहा हूं कि हम यह समझ सकें कि पाकिस्तान आज जहां है, वह मंजिल बरसों पहले ही वहां के जनमानस में भर दी गई थी। दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल की तर्ज पर बने गीत यूं दी हमें आजादी.... की कुछ लाइनें देखिए। इनसे ऐतिहासिक तथ्यों और पाकिस्तान के कुलीन वर्ग के बीच की खाईं का अंदाजा लगाया जा सकता है-

हर सिम्त मुसलमानों पर छाई थी तबाही

मुल्क अपना था और गैरों के हाथों में थी शाही

ऐसे में उठा दीन-ए-मुह्म्मद का सिपाही

और नारा-ए-तकबीर से दी तूने गवाही

इसलाम का झंडा लिये आया सरे मैदान

ऐ कायद-ए-आजम तेरा अहसान है अहसान....

नक्शा बदल के रख दिया इस मुल्क (पाकिस्तान) का तूने

साया था मुहम्मद का, अली का तेरे सिर पे

दुनिया से कहा तूने, कोई हमसे न उलझे

लिक्खा है इस जमीं पे शहीदों ने लहू से

आजाद हैं, आजाद रहेंगे ये मुसलमान

ऐ कायद-ए-आजम तेरा अहसान है अहसान....




रिटेल का खेल

रिटेल में एफडीआई को लेकर खूब हल्ला मच रहा है। 1 दिसंबर को भारत बंद भी रखा गया। विरोध और समर्थन, दोनों तरफ के लोग अफलातूनी बयान दे रहे हैं। मैं दो बातें यहां रखना चाहता हूं जिन पर गौर करने की जरूरत है। पहली बात यह कि किराना दुकानदारों की संख्या अपने देश में एक करोड़ बताई जा रही है। सवाल यह है कि यह संख्या कहां से आयी? इस लिहाज से देखा जाए तो 130 करोड़ की आबादी वाले अपने देश के हर 130 लोगों (इसमें करीब 25 फीसदी बच्चे भी शामिल हैं) पर एक किराने की दुकान है। जरा अपने गांव या मोहल्ले पर नजर डालिए और जांचिए इस आकड़े की सच्चाई को। दूसरी बात, 1 दिसंबर को पंजाब में बंद नहीं रहा जबकि वहां विपक्षी दलों की सरकार है। इस पर भी गौर करना चाहिए कि ऐसा क्यों है और पंजाब वाले बाकी देश से अलग क्यों सोचते हैं? मेरा कहने का मतलब यह कतई नहीं है कि रिटेल में एफडीआई को लेकर घोषित केंद्र की मौजूदा नीति का समर्थन किया जाए लेकिन इतना जरूर है कि विरोध व समर्थन करने वाले लोगों को तर्कसंगत बातें करनी चाहिए। अन्यथा, वही होगा जो नब्बे के दशक में डंकेल ड्राफ्ट के विरोध का हुआ। उस समय ये लोग कह रहे थे कि डंकेल आएगा और हमारी फसल काट ले जाएगा। आडवाणी जी से लेकर लालू जी तक। बाद में जब इनकी सरकारें आईं तो वित्तमंत्री उन्हीं लोगों को बनाया गया जो डंकेल प्रस्तावों को लागू कर सकें। अगर उस समय विरोधी दल गंभीरता से मुद्दा उठाते और कोई समझदारी भरी बहस चलाते तो शायद हम उस बहस से निकले रास्ते पर चल रहे होते। तब भी शायद मकसद सिर्फ सत्तापक्ष के खिलाफ माहौल बनाना था (न कि विचार के स्तर पर कोई रास्ता बनाने का)। आज भी जो हो रहा है, वह उन्हीं डंकेल प्रस्तावों का हिस्सा है। विरोध करने वाले राजनीतिक दल इस बार भी क्या सिर्फ सत्तापक्ष के खिलाफ माहौल बनाने का काम नहीं कर रहे?





और अंत में...

फेसबुक पर एक कविता पढ़ी, मजा आया। आप भी पढ़िए...

जन-गण-मन के देवता

अब तो आंखें खोल

मंहगाई से हो गया जीवन डांवाडोल

जीवन डांवाडोल, ख़बर लो शीघ्र कृपालु

कलाकंद के भाव बिक रहा बैगन-आलू।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

यह प्रवृत्ति हमें कहां ले जाएगी

यदृच्छया/राजेंद्र तिवारी
प्रभात खबर से साभार



बीते हफ्ते दिल्ली में हरविंदर सिंह नाम के एक युवक ने कृषि मंत्री शरद पवार को चांटा मार दिया। इसको लेकर तमाम तरह की बातें हो रही हैं। जो गांधी कहते थे कि कोई तुम्हारे एक गाल पर चांटा मारे, तुम अपना दूसरा गाल आगे कर दो, वहीं इस समय देश में उम्मीद की निगाहों से देखे जाने वाले बुजुर्ग गांधीवादी नेता की पवार प्रकरण पर त्वरित प्रतिक्रिया थी- बस एक ही मारा! प्रमुख विपक्षी दल के एक प्रमुख नेता ने कहा कि मंहगाई से परेशान लोग हिंसक हो उठेंगे। फेसबुक पर देखें तो कई पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी माने जाने वाले लोग लिख रहे हैं कि बहुत कोशिश की पवार को चांटा मारे जाने का विरोध करूं लेकिन कर नहीं पा रहा हूं। यह पहली घटना नहीं है, इससे पहले भी इस तरह की घटनाएं हुई हैं। हरविंदर जैसे सामान्य व्यक्ति ही नहीं, जितिन प्रसाद जैसे सांसद, जिन्हें हम युवा पीढ़ी का राजनीतिक मानते हैं, भी हाथ छोड़ने में पीछे नहीं हैं। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का अभिमान करने वाले हमारे समाज को क्या होता जा रहा है और क्यों होता जा रहा है? कहां गड़बड़ हो रही है? यह राजनीतिकों को ही नहीं, हम-आप को भी सोचना पड़ेगा। इस सवाल के मूल में जाना पड़ेगा और इसका समाधान खोजना होगा। मुझे कुछ वाकये याद हैं, जो बचपन में मैंने अपने गांव में दादा जी से और अपने गांव वाले स्कूल सुने-देखे थे। कुछ वाकये बड़े होने पर राजनीतिकों से सुने। उनमें कुछ शेयर करना चाहूंगा-
बचपन में मेरे दादा जी ने यह वाकया सुनाया था। बात 50 के दशक की है, खटीमा में नेहरू जी की सभा थी। खटीमा उत्तर प्रदेश के तराई इलाके में पड़ता था, जहां पाकिस्तानी पंजाब से आए सिखों को बसाया गया था। अब यह उत्तराखंड का हिस्सा है। बीच में चौकी डालकर माइक लगा दिया गया था। लोग उस चौकी के सामने बड़ी संख्या में एकत्र थे। लोग 100-100 किलोमीटर से खुद चलकर नेहरू को सुनने आए थे। नेहरू बोल रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि एक तरफ कुछ सिख युवक उनको काला झंडा दिखा रहे थे। नेहरू ने भाषण रोका, चौकी से नीचे उतरे और भीड़ को चीरते हुए उन युवकों के पास पहुंच गए। उनके हाथ से काला झंडा लिया और उसे फाड़कर फेंक दिया। युवकों को कुछ समझाया और फिर लौटकर भाषण शुरू किया।
दूसरी घटना मेरे गांव के पास के उस स्कूल की है, जहां से मैंने स्कूली पढ़ाई पूरी की। इमरजेंसी खत्म हो गई थी। चुनाव प्रचार चल रहा था। मेरा स्कूल संघ के प्रभाव वाला था और उसके कई शिक्षक संघ की शाखाएं लगाने का काम करते थे। वहां पहले जेपी की सभा हुई। पांच बच्चों को जेपी के लिए स्वागत गान गाने के लिए चुना गया। मैं भी उनमें से था। बाद में इंदिरा गांधी की सभा भी उसी स्कूल में हुई और वही हम पांच बच्चे उनके स्वागत में भी वही गान गाने के लिए चुने गए।
तीसरी घटना जो मैने लखनऊ के समाजवादी नेता चंद्रदत्त तिवारी जी से सुनी थी। 1966 में प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी अपने गृहनगर इलाहाबाद आने वाली थीं। 1965 के युद्ध की वजह से महंगाई चरम पर थी। इलाहाबाद में जहां कांग्रेसी लोगों ने उनके स्वागत की तैयारी की, वहीं कुछ अन्य लोगों ने महंगाई के विरोध में उन्हें काला झंडा दिखाने की घोषणा की। इंदिरा गांधी आईं तो सड़क के एक तरफ के लोग कांग्रेसी तिरंगे को लहरा कर उनका स्वागत कर रहे थे तो सड़क के दूसरी तरफ काला झंडा दिखाकर उनके सामने विरोध जता रहे थे। उस समय जतिन प्रसाद की तरह कांग्रेस के नेताओं ने काले झेंडे वालों पर लात घूंसे बरसाने नहीं शुरू कर दिए थे।
एक घटना अभी टीवी पर सुनी मोहन सिंह से। वह बता रहे थे कि फिरोज गांधी इलाहाबाद से चुनाव लड़ रहे थे। उनके विरोधी सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार नंदलाल के पास कार नहीं थी। फिरोज गांधी दोपहर 12 बजे से शाम चार बजे तक आराम करते थे। इस दौरान वे अपनी कार नंदलाल को दे देते कि लो तब तक आप इस कार से अपना प्रचार कर लीजिए।
हम कहां से कहां आ गए हैं। हमारा देश भले आज समृद्धि की राह पर बढ़ने का दावा कर रहा हो लेकिन हमारे समाज में जो प्रवृत्तियां पनप रही हैं, वे कतई विकसित समाज की ओर ले जाने वाली नहीं हैं।
और अंत में...
हम सब ने एक गीत जरूर सुना होगा हम लाये हैं तूफान से किस्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के। जागृति फिल्म का यह गीत प्रदीप ने लिखा था और अभि भट्टाचार्या पर फिल्माया गया था। इसी तरह का एक गीत और पढ़िए यहां। इसके बारे बात अगले रविवार को करेंगे-
बरसों के बाद फिर उड़े परचम हिलाल के
हम लाये हैं तूफान से किश्ती निकाल के
इस मुल्क को रखना मेरे बच्चों संभाल के
देखो कहीं उजड़े न हमारा ये बगीचा
इसको लहू से अपने शहीदों ने है सींचा
इसको बचाना जान मुसीबत में डाल के
हम लाये हैं...
दुनिया के सियासत के अजब रंग हैं न्यारे
चलना है तुमको तो मगर कुरान के सहारे
हर एक कदम उठाना जरा देखभाल के
इस मुल्क को रखना मेरे...
तुम राहत-ओ-आराम के झूले में न झूलो
काटों पे है चलना मेरे हंसते हुए फूलों
लेना अभी कश्मीर है, ये बात भूलो
कश्मीर में लहराएंगे झंडा उछाल के
इस मुल्क को रखना मेरे बच्चों संभाल के।

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

पाकिस्तान में जड़ों से जुड़ने की अकुलाहट!

पाकिस्तान में झूठा और तोड़-मरोड़ा हुआ इतिहास स्कूलों में पढ़ाए जाने के खिलाफ एक बार फिर आवाज उठने लगी है। पिछले चार माह से वहां के अखबार एक्सप्रेस ट्रिब्यून में लगातार इस विषय पर लिखा जा रहा है। यहां तक कि पाकिस्तान के एक सांसद रजा रब्बानी ने मांग तक कर दी कि बच्चों को इतिहास में महाराजा रणजीत सिंह और सरदार भगत सिंह की भूमिकाओं को पढ़ाया जाए। करीब आठ-नौ साल पहले मैंने पाकिस्तान के स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली इतिहास की कुछ पुस्तकें कश्मीर में देखीं थीं। उर्दू जानने वाले अपने मित्रों की मदद से मैंने जो कुछ समझा उसके मुताबिक वहां जो इतिहास पढ़ाया जाता है, वह सिर्फ भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलिम शासकों की जानकारी देता है और वह इस प्रकार जैसे वे सब सच्चाई के पुजारी रहे हों और उनका एक मात्र मकसद इसलाम का विस्तार करना था। ट्रिब्यून के कालमनिस्ट फरहान अहमद शाह भी यही बात कहते हैं और अपने कालम में यह लिखने का साहस कर रहे हैं कि अधिकतर मुसलिम शासक या तो लुटेरे थे या फिर आक्रमणकारी। गैर मुसलिम शासकों का नाम तक पाकिस्तान के इतिहास में नहीं लिया जाता। इसकी वजह से पाकिस्तान के इतिहास में गजनवी, गौरी, तुगलक, मुगल आदि ही छाए हैं जैसे चंद्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त, अशोक, शेरशाह सूरी आदि कभी हुए ही न हो। अकबर को इसलाम विरोधी के तौर पर इतिहास में चित्रित किया जाता है और औरंगजेब को नायक के तौर पर। पिछले 10 साल में पाकिस्तान जिस तरह तालिबान की गिरफ्त में आ गया है और वहां की सिविल सोसाइटी (कुलीन वर्ग) इनके आगे शायद असहाय महसूस करने लगी है। क्योंकि आजादी के बाद से वहां के स्कूलों, इतिहास की किताबों और कश्मीर के जरिए बच्चों के दिमाग को जिस तरह से कंडीशन किया गया, उसके परिणाम अब वहां की सिविल सोसाइटी को दबाव में ला रहे हैं। वे बच्चे अब बड़े हो चुके हैं और उनके बच्चे उन्हीं की सरपरस्ती में बड़े हुए हैं। लिहाजा, अब वे सिविल सोसाइटी की चाबुक सहने को तैयार नहीं हैं। वे तो अब खुद अपनी चाबुक से सिविल सोसाइटी को हांकना चाहते हैं। अब उन कुलीनों की समझ में आ रहा है कि गड़बड़ कहां हुई। और, वे अब इस गड़बड़ को सुधारना चाहते हैं और मुखर होकर पूछ रहे हैं कि यदि महमूद गजनवी इसलाम का प्रचारक था तो उसने मुलतान के तत्कालीन मुसलिम शासक की हत्या क्यों की? उसने गद्दी पाने के लिए अपने भाई की हत्या क्यों की? उसने भारतीय उपमहाद्वीप पर 17 बार आक्रमण इसलाम के प्रचार के लिए किया या यहां की धन-दौलत को लूटने के लिए? ऐसे ही सवाल सिविल सोसाइटी मुह्म्मद गौरी को लेकर पूछ रही है – कि हमारी (पाकिस्तान की) इतिहास की किताबें यह क्यों नहीं बतातीं कि यदि मुहम्मद गौरी का एजेंडा इसलाम का प्रसार ही था तो उसने गजनवी वंश के आखिरी राजा मलिक खुसरो पर हमला क्यों किया? वे अपनी जमीन के नायकों को लेकर भी सवाल पूछ रहे हैं। वे सरकार से पूछ रहे हैं कि हम यह क्यों नहीं पढ़ाते कि हमारी जमीन हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख जैसे धर्मों की जननी रही? हमारी जमीन तक्षशिला जैसे ज्ञानकेंद्र की जमीन रही है? हमारी जमीन मोहन जोदाड़ो सभ्यता की जमीन रही है? ये सवाल सब जगह उठ रहे हैं और पाकिस्तान में दबाव बन रहा है। सिंध की प्रांतीय सरकार ने अपने यहां के स्कूली पाठ्यक्रम में संशोधन के लिए एक कमेटी बनाई है। यह कमेटी अन्य बातों को साथ-साथ ऐतिहासिक तथ्यों को सही रूप में इतिहास की किताबों में रखने पर भी विचार कर रही है। हो सकता है कि बदलाव की शुरुआत सिंध से ही हो जाए और वहां के बच्चे दाहिर को आतताई और मोहम्मद बिन कासिम को दयालु और इसलाम के प्रचारक के तौर पर पढ़ने के अभिशाप से मुक्ति पा जाएं। और अंत में... पाकिस्तान के तरक्कीपसंद शायर हबीब जलाली (1928-1993) के बारे में कहा जाता है कि उनकी आधी जिंदगी जेल में गुजरी और आधी सड़क पर। हबीब का जन्म पंजाब के होशियारपुर जिले में हुआ था। आजादी के वक्त वे मैट्रिक की पढ़ाई कर रहे थे। उनके वालिद ने उस दौरान पाकिस्तान जाने का फैसला किया और हबीब पाकिस्तान चले गए। अयूब खान द्वारा मार्शल ला लगाए जाने के विरोध करने पर उन्हें पहली बार जेल में डाला गया और उसके बाद यह सिलसिला उनकी मौत तक जारी रहा। पढ़िए इस तरक्कीपसंद शायर की ये लाइनें.... इक पटरी पर सर्दी में अपनी तक़दीर को रोए दूजा जुल्फ़ों की छाया में सुख की सेज पे सोए राज सिंहासन पर इक बैठा और इक उसका दास भए कबीर उदास   ऊंचे ऊंचे ऐवानों में मूरख हुकम चलाएं क़दम क़दम पर इस नगरी में पंडित धक्के खाएं धरती पर भगवान बने हैं धन है जिनके पास भए कबीर उदास   कल तक जो था हाल हमारा हाल वही है आज ‘जालिब’ अपने देस में सुख का काल वही है आज फिर भी मोची गेट पे लीडर रोज़ करे बकवास भए कबीर उदास

रविवार, 13 नवंबर 2011

यहां से कोई न्यूटन नहीं बन जाने वाला

यदृच्छया/राजेंद्र तिवारी
प्रभात खबर से साभार


बीते शुक्रवार शिक्षा दिवस था यानी आजाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद की जन्मतिथि। इसी दिन एक अखबार में खबर छपी कि झारखंड में लेक्चरर पात्रता परीक्षा (जेट) में अंकों में फेरबदल करके 100 ऐसे लोगों को नियुक्ति दे दी गई जो इसके पात्र ही नहीं थे। बाकी नियुक्तियों में भी घपलेबाजी हुई। यह मामला सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं है। देश में हर जगह, लगभग हर विश्वविद्यालय और महाविद्यालय में यही हो रहा है। और इसका नतीजा भी सामने है। ह्यूमन रिसोर्स एंड स्टाफिंग एजंसी टीमलीज सविर्सेज की रिपोर्ट में कहा गया है कि 90 फीसदी भारतीय युवा रोजगार के लायक नहीं हैं। इसकी इंडिया लेर रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 90 फीसदी जाब्स स्किल बेस्ड हैं जो खेती, मत्स्य पालन, निर्माण आदि क्षेत्रों में निकलते हैं। ग्रेजुएट होने वाले 90 फीसदी युवाओं की जानकारी सिर्फ किताबी होती है और इसीलिए उनमें रोजगारयोग्यता नहीं होती। नतीजा यह होता है कि या तो इन लोगों जाब ही नहीं मिलती और मिलती भी है तो बहुत कम सेलरी पर। भारत में सामान्य ग्रेजुएट की सालाना औसत सेलरी 75000 रुपए है। यानी सवा छह हजार रुपए मासिक। रिपोर्ट में कहा गया कि यदि भारत में शिक्षा का यही हाल रहा तो भले ही जीडीपी के आंकड़े कुलांचे भरते रहें लेकिन भारत विकसित देशों की कतार में नहीं खड़ा हो पाएगा। मुझे पिछले साल का एक वाकया याद आ रहा है। आप भी सुनिए...
मेरे एक मित्र एक प्रतिष्टित विश्विद्यालय में फिजिक्स पढ़ाते हैं। अगस्त का महीना था और मैं उनसे मिलने उनके विभाग गया। 11 बजे से बीएससी प्रथम वर्ष के छात्रों का प्रैक्टिकल क्लास था जो उनके जिम्मे था। उनके साथ एक और लेक्चरर थे। करीब 40 बच्चे और दो शिक्षक। उन्होंने मुझसे कहा कि क्लास में चलते हैं, वहीं बीच में चाय पी लेंगे। मुझे भी उत्सुकता हुई कि देखें, 25 साल पहले जब हम बीएसएसी प्रथम वर्ष में थे, तबके छात्रों और आज के छात्रों में क्या अंतर है। मैं खुशी-खुशी उनके साथ हो लिया। प्रैक्टिकल क्लास लगभग 20-22 छात्र ही थे। मेरे मित्र ने उन सबकी अटेंडेंस भरी और साथ-साथ परिचय भी लिया। कोई भी छात्र 80 फीसदी से कम अंक वाला नहीं था। हमारे समय में यह सीमा 60 फीसदी होती थी। फिर उन्होंने बातचीत शुरू की और पूछा वर्नियर कैलीपर्स और स्क्रूगेज से रीडिंग लेना किस-किस को आता है। मुझे लगा कि सबको आता ही होगा क्योंकि मेरे समय में शिक्षक यह मानकर चलते थे कि प्रथम श्रेणी में 12वीं पास करने वाले छात्रों को यह तो आता ही होगा और अधिकतर को आता ही होता था। लेकिन यह क्या? एक भी छात्र या छात्रा ने हाथ नहीं उठाया। मेरे लिए यह चौंकाने वाली बात थी लेकिन मेरे मित्र ने शांत भाव से अगला सवाल पूछा, किस-किस ने वर्नियर कैलीपर्स देखा है? यह क्या सिर्फ चार ने हाथ उठाया। यह और ज्यादा चौंकाने वाली बात थी। मैं चुपचाप देख-सुन रहा था और सोच रहा था कि फिर इन बच्चों ने 80 फीसदी अंकों के साथ 12वीं पास कैसे किया होगा। इसी बीच, जिन लेक्चरर साहब की ड्यूटी थी, वे उठे और मुझसे कहने लगे कि चलिये स्टोर में बैठते हैं, वहीं चाय मंगाई है। मेरे मित्र ने कहा कि तुम लोग चलो, मैं इन सबको कुछ असाइनमेंट देकर आता हूं। वे वर्नियर कैलीपर्स और स्क्रूगेज से रीडिंग लेना सिखा रहे थे। हम स्टोर में जाकर बैठे। करीब 15 मिनट बाद चाय भी आ गई। लेक्चरर साहब ने लैब असिस्टेंट से कहा कि जाकर डाक्टर साहब (मेरे मित्र) को बता दो कि चाय ठंडी हो रही है। असिस्टेंट गया और बता कर आ गया। लेकिन डाक्टर साहब नहीं आए। वे छात्रों के साथ व्यस्त थे। लेक्चरर साहब थोड़ी देर बाद खीझ कर बोले, हम लोग तो अपनी चाय ठंडी न करें। डाक्टर साहब तो आज ही सबकुछ पढ़ा देंगे। अरे भाई, जब छात्र पढ़ना नहीं चाहते तो बेकार में उनके साथ मगजमारी करने से क्या फायदा। डाक्टर साहब बहुत झक्की हैं। आप तो इनके मित्र हैं, इनको समझाइए कि ये इतनी मेहनत कर देंगे तो भी यहां से कोई न्यूटन या आइंसटीन नहीं बन जाने वाला। इतना क्या कम है कि हम अपना सिलेबस पूरा कर दें। अब समझना छात्रों की जिम्मेदारी है, वे चाहें तो समझें और चाहें तो न समझें। चाय खत्म हो गई। हमने उनसे विदा ली और अपने मित्र डाक्टर साहब से भी। मेरी समझ में आने लगा था कि क्या अंतर आया है तब में और अब में।

औऱ अंत में...

लोक कवि त्रिलोचन शास्त्री (1917-2007) हिंदी कविता में सानेट के जनक माने जाते थे। उन्होंने सानेट में जितने प्रयोग किए उतने शायद स्पेंसर, मिल्टन और वर्ड्सवर्थ जैसे कवियों ने भी नहीं किए थे। उनका एक सानेट पढ़िए-

सह जाओ आघात प्राण, नीरव सह जाओ
इसी तरह पाषाण अद्रि से गिरा करेंगे
कोमल-कोमल जीव सर्वदा घिरा करेंगे
कुचल जाएंगे और जाएंगे। मत रह जाओ
आश्रय सुख में लीन। उठो। उठ कर कह जाओ
प्राणों के संदेश, नहीं तो फिरा करेंगे
अन्य प्राण उद्विग्न, विपज्जल तिरा करेंगे
एकाकी। असहाय अश्रु में मत बह जाओ।

यह अनंत आकाश तुम्हे यदि कण जानेगा
तो अपना आसन्य तुम्हे कितने दिन देगा
यह वसुधा भी खिन्न दिखेगी, क्षण जानेगा
कोई नि:स्वक प्राण, तेज के कण गिन देगा
गणकों का संदोह, देह व्रण जानेगा
और शून्य प्रासाद बनाएगा चिन देगा

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

ठीक से काम न करने का भी पैसा, है न मजेदार बात!

यदृच्छया/राजेंद्र तिवारी
प्रभात खबर से साभार



पिछले हफ्ते ट्रेन से गया जा रहा था। हरिद्वार-शालीमार स्पेशल ट्रेन से। ट्रेन के लखनऊ स्टेशन पर समय से पहुंचने की घोषणा हो रही थी। जब ट्रेन के आने का निर्धारित समय हो गया तो घोषणा की जाने लगी कि यात्रीगण कृपया ध्यान दें, ट्रेन संख्या 08044 जो हरिद्वार से चलकर वाया मुरादाबाद, लखनऊ शालीमार जा रही है, कुछ ही समय में प्लेटफार्म संख्या एक पर आ रही है। यह घोषणा पूरे 20 मिनट तक होती रही जबकि इस दौरान ट्रेन के आने व रवाना होने का निर्धारित समय बीत गया। ट्रेन आयी। अंदर पहुंचे। हमने सोचा था कि ट्रेन में श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास बिश्रामपुर का संत पढ़कर खत्म कर देंगे। लेकिन ट्रेन में जो बर्थ हमें मिली, उसकी रीडिंग लाइट ही नहीं जल रही थी। आसपास की बर्थ खाली थीं। लिहाजा हम दूसरे पर शिफ्ट होने के लिए टीटी से बात की। लेकिन यह क्या, उस कूपे में एक भी बर्थ की रीडिंग लाइट नहीं जल रही थी। सफाई का आलम यह कि बर्थ पर स्वागत के लिए काक्रोचों के साथ कीड़े-मकोड़ों की पूरी फौज मौजूद थी। किसी तरह उनको बर्थ से नीचे उतारा और अपना कब्जा जमाने के लिए रेलवे प्रदत्त पैकेट से चादर निकालकर बिछाने का उपक्रम शुरू किया। देखा तो चादर धुली हुई नहीं थी। उपयोग की जा चुकी चादर को फिर से तह करके पैकेट में रख दिया गया था।
मेरे सामने वाली बर्थ पर एक भाई साहब और थे जो किसी कृषि कंपनी में रिसर्च अधिकारी थे। गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि, पंतनगर (उत्तराखंड) से पीएचडी करने के बाद वे निजी क्षेत्र में आ गए थे। उनकी चिंता थी कि क्या यह ट्रेन सुबह अपने निर्धारित समय पर गया पहुंच जाएगी। उन्होंने टीटी से पूछा। टीटी का जवाव था, सर ठीक से चलती रहेगी तो पहुंच जाएगी। सामने वाले भाईसाहब झुंझलाए और झुंझलाहट में मुझे गणित जुड़वाने लगे। उन्होंने शुरू किया, भाईसाहब क्या आप जानते हैं कि अपने देश के सरकारी विभाग ऐसी जगहें हैं जहां काम करने वालों को ठीक से काम न करने का अतिरिक्त भुगतान होता है। ट्रेन को टाइम से चलाना रेलवे के कर्मचारियों की मूल जिम्मेदारी है। ट्रेन लेट हो जाने का मतलब है कि रेलवे के कर्मचारियों ने अपनी मूल जिम्मेदारी नहीं निभाई। ट्रेन लेट होने पर इन कर्मचारियों से जवाबतलब होना चाहिए लेकिन होता इसका उलटा है और ट्रेन लेट होने पर कर्मचारियों को ओवर टाइम यानी ओटी मिलता है। देश में रोज लगभग 50 हजार ट्रेनें चलती हैं और इन पर तीन करोड़ लोग यात्रा करते हैं। यदि ट्रेन लेट होने की वजह से इन तीन करोड़ लोगों का रोजाना औसतन एक घंटा खराब हुआ तो रोजाना तीन करोड़ मानव घंटे बेकार गए। यदि हम न्यूनतम मजदूरी दर ही लें तो रोजाना काम के आठ घंटे के हिसाब से हर घंटा न्यूनतम 15 रुपए का बैठा। यानी रोजाना 45 करोड़ का नुकसान और महीने में यह नुकसान हुआ 1350 करोड़ का। साल में यह नुकसान बैठा 16200 करोड़ रुपए। रेलतंत्र यह नुकसान कराने की एवज में अरबों का ओटी जिम्मेदार कर्मचारियों को बांटता होगा। भाईसाहब बोले जा रहे थे, एक हम लोग हैं रिजल्ट नहीं दिया तो वैरिएबल प्रोडक्टिविटी एलाउंस तो गया ही (यानी वेतन कम मिला), नौकरी भी खतरे में पड़ जाती है। मैं सोचने लगा कि यह गणित यदि हर सरकारी विभाग में लगाई जाए तो शायद हम पाएंगे कि हमारे सरकारी विभागों में जवाबदेही के अभाव और उनकी अकर्मण्यता की कीमत हम एक राष्ट्र के तौर पर अरबों-खरबों में रोजाना अदा करते हैं।
और अंत में
वीरेन डंगवाल पिछले दो दशक से हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं। 1947 में उत्तराखंड में जन्मे वीरेन डंगवाल में नागार्जुन व त्रिलोचन का लोकतत्व और महाकवि निराला का फक्कड़पन एक साथ मौजूद है। उनकी कविताएं उड़िया, बांग्ला, पंजाबी, मराठी, मलयालम आदि भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेजी में भी अनूदित हुई हैं। यहां प्रस्तुत है उनकी एक कविता...

इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी
गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कुव्वत सारी प्रतिभा
किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया
ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया?

इतने दुर्गम मत बन जाना
सम्भव ही रह जाय न तुम तक कोई राह बनाना
अपने ऊंचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए
लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना

इतने चालू मत हो जाना
सुन-सुन कर हरक़ते तुम्हारी पड़े हमें शरमाना
बग़ल दबी हो बोतल मुँह में जनता का अफसाना
ऐसे घाघ नहीं हो जाना

ऐसे कठमुल्ले मत बनना
बात नहीं हो मन की तो बस तन जाना
दुनिया देख चुके हो यारो
एक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो
पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव
कठमुल्लापन छोड़ो
उस पर भी तो तनिक विचारो

काफ़ी बुरा समय है साथी
गरज रहे हैं घन घमण्ड के नभ की फटती है छाती
अंधकार की सत्ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन
जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती
संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी